Hindi Story

Hindi Story - हिंदी स्टोरी 



Today we are writing Hindi Story. This story is for everyone, especially for kids. This Hindi Story may also be helpful for all. Like:- Kids, Parents, Elders, and teachers to teach kids. This Hindi Story is about Gillu.

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(Hindi Story)

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अचानक एक दिन सुबह कमरे से बरामदे में आकर मैंने देखा कि दो कौवे एक गमले के चारो ओर ज़ोर-ज़ोर से काँव-काँव करते हुए छुआ -छुआहु जैसा खेल खेल रहे थे। मैंने पास जा कर देखा तो वहा एक  गिलहरी का छोटा-सा बच्चा था जो शायद अपने घोसले से गिर पड़ा है और अब कौवे उसे अपना अच्छा और स्वादिष्ट भोजन समझ रहे है। बच्चा डरा-सहमा गमले से चिपका हुआ था। 

सब ने कहा कि कौवे की चोंच का घाव लगने के बाद यह बच नहीं सकता। इसे ऐसे ही छोड़ दो। लेकिन मेरा मन नहीं माना। मैं उसे हौले से उठा के अपने कमरे में ले आयी। फिर रुई से रक्त पोंछ कर घाव पर मरहम लगाया। रुई की पतली बत्ती ढूढ़ में भिगो कर जैसे-तैसे उसके नन्हे मुँह पर लगाई पर मुँह खुल नहीं सका और दूध की बूंदे मुँह के दोनों ओर लुढ़क गयी। 

कई घंटो में उपचार के बाद उसके मुँह में एक बूंद पानी टपकाया जा सका। 3-4 महीने में भरे-भरे रोएँ, झब्बेदार पुँछ और चंचल चमकीली आँखे सबको भाने लगी। हम उसे गिल्लू कह कर बुलाने लगे। मैंने फूल रखने की हलकी डलिया में रुई बिछा कर उसे तार से खिड़की पर लटका दिया। वही डलिया दो वर्ष तक गिल्लू का घर रहा। वह खुद ही डलिया को हिला कर उसमे झूलता और अपनी काँच के मणकों सी आँखों से कमरे के अंदर और खिड़की के बाहर ना-जाने क्या देखता और समझता रहता था। लेकिन उसकी समझदारी और कार्य-कलाप पर सबको आश्चर्य होता था। 


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जब भी मैं लिखने बैठती तो मेरा ध्यान अपनी ओर करने की उसे बहुत तीव्र इच्छा होती कि उसने एक अच्छा उपाय खोज निकाला। वह मेरे पैर तक आ कर सर्र-से परदे पर चढ़ जाता और फिर उसी तेज़ी से उतरता। उसका यह दौड़ने का क्रम तब तक चलता रहता जब तक मैं उठ कर उसे पकड़ नहीं लेती। कभी मैं गिल्लू को पकड़ कर उसे लम्बे लिफाफे में इस प्रकार रख देती कि उसके अगले दो पंजो और सर के अलावा उसका सारा शरीर लिफाफे के अंदर बंद रहता।

इस अद्बुध स्तिथि में कभी-कभी घंटो मेज़ पर दिवार के सहारे खड़ा रह कर वह अपनी चमकीली आँखों से मेरा कार्य-कलाप देखा करता। भूख लगने पर चिक-चिक करके मानो वह सूचना देता और काजू  बिस्कुट मिल जाने पर उसी स्तिथि में लिफाफे से बाहर वाले पंजो से पकड़ कर उसे कुतरता रहता। नीम और चमेली की गंद मेरे कमरे में हौले-हौले आने लगी। बाहर की गिलहरियाँ खिड़की की जाली पास आ कर चिक-चिक करके ना जाने क्या कहने लगी। गिल्लू को जाली के पास बैठ कर अपने-पन से बाहर झांकते देख कर मुझे लगा कि उसे मुक्त  करना आवश्यक है। मैंने कीले निकाल कर जाली का एक कोना खोल दिया और इस मार्ग से बाहर जाने पर गिल्लू ने सच-मुच् ही मुक्ति की सांस ली।

इतने छोटे से जीव को घर में पले कुत्ते-बिल्ली से बचा कर रखना भी समस्या ही थी। आवश्यक कागज़-पत्रों के कारण मेरे बाहर जाने पर कमरा बंद ही रहता है। कॉलेज से लौटने पर जैसे ही कमरा खोला गया और मैंने अंदर पैर रखा वैसे ही गिल्लू भी अपने जाली के द्वार से अंदर आ कर मेरे पैर से सर और सर से पैर तक दौड़ने लगा। तब से यह रोज़ ही होने लगा। मेरे कमरे से बाहर जाने पर गिल्लू भी खिड़की की खुली जाली के रास्ते बाहर चला जाता और दिन-भर गिलहरियों के झुंड का नेता बना हर डाली पे उछलता-कूदता रहता और ठीक चार बजे खिड़की से अंदर आ कर अपने झूले में झूलने लगता।


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मुझे चौकाने की इच्छा ना जाने उसमे कब और कैसे जग उठी थी। वो कभी फूलदान के फूलो में चुप जाता तो कभी परदे की चुननट में और कभी सोनजुही की पत्तियों में। मेरे पास बहुत से पशु-पक्षी है और उनसे मेरा लगाव भी कम नहीं है। लेकिन उनमे से किसी की भी मेरे साथ मेरी थाली में खाने की हिम्मत हुई है ऐसा मुझे याद नहीं आता। गिल्लू इन सबसे ज़्यादा बदमाश था। मैं जैसे ही खाने के कमरे में पहुँचती तो वह खिड़की से निकल कर आँगन की दिवार, बरामदा पार कर के मेज़ पर पहुँच जाता और मेरी थाली में बैठ जाना चाहता।


बड़ी कठिनाई से मैंने उसे थाली के पास बैठना सिखाया। जहाँ बैठ कर वो मेरी थाली से एक-एक चावल उठा कर बड़ी सफाई से खाता था। खाजू उसका मन-पसंद खाना था और कई दिन काजू ना मिलने पर वो बाकी खाने की चीज़े या तो लेना बंद कर देता था या फिर झूले से नीचे फेक देता था। उस बिच मुझे मोटर-घटना में आहत हो कर कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ा। उन दिनों जब मेरे कमरे को खोला जाता तो गिल्लू अपने झूले से उतर कर दौड़ता और फिर किसी दूसरे को देख कर उसी तेज़ी से अपने घोसले में जा बैठता।

सब उसे काजू दे जाते। लेकिन अस्पताल से लोट कर जब मैंने उसके झूले की सफाई की तो उसमे काजू भरे मिले जिससे पता चलता है कि इन दिनों वो अपना मन-पसंद खाना भी कितना कम खाता था। मेरी अस्वस्थता में वह तकिये पर सिरहाने बैठ कर अपने नन्हे-नन्हे पंजो से मेरे सर और बालो को इतने हौले-हौले सहलाता रहता कि हटना एक नर्स के हटने के बराबर ही था।

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गर्मियों में जब मैं दोपहर में काम करती रहती तो गिल्लू ना बाहर जाता और ना ही अपने झूले में बैठता। उसने मेरे साथ रहने के साथ-साथ गर्मी से बचने का उपाय भी खोज निकाला। वह मेरे पास रखी सुराही पर लेट जाता और इस प्रकार वो मेरे पास भी रहता और ठंडक में भी रहता। गिलहरियों के जीवन की अवधि दो वर्ष से अधिक नहीं होती। गिल्लू की जीवन यात्रा का अंत आ ही गया। दिन-भर उसने ना कुछ खाया और ना ही बाहर गया। रात में अंत की यातना में भी वह अपने झूले से उतर कर मेरे बिस्तर पर आया और ठन्डे पंजो से मेरी वही ऊँगली पकड़ कर हाथ से चिपक गया जिसे उसने अपने बचपन की मरणासन (मरने) की स्तिथि में पकड़ा था। पंजे इतने ठन्डे हो रहे थे कि मैंने जाकर हीटर चलाया और उसे गर्माहट देने की कोशिश की। लेकिन सुबह की पहली किरण के साथ ही किसी और जीवन में जागने के लिए वह सो गया।


यह हिंदी कहानी महादेवी वर्मा की रचना है। आपको यह हिंदी कहानी कैसी लगी हमे कमेंट में ज़रूर बताइयेगा। जिससे हमे और भी कहानिया लिखने की प्रेरणा मिलेगी। 

This Hindi story is the creation of Mahadevi Verma. If you like this Hindi story make sure you tell us to encourage us to write more stories.

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